कई तरह की संज्ञाएं हैं: पाखाना, टट्टी, दीर्घ शंका, दिशा मैदान, मलत्याग, टॉएलेट...। पर क्रिया एक ही है। हम में से हर एक इस क्रिया को हर रोज़ करता है। इस क्रिया का अनुभव और नतीजा लेकिन हर किसी का अलग होता है। कोई खुले में जाता है, कोई बमपुलिस में, कोई चमचामते शौचालय में।

किसी का मल खुले में पड़ा रहता है, जानलेवा बीमारियां फैलाता है। किसी का मल-मूत्र सीवर की नालियों से होता हुआ नदी-तालाब को ही नहीं, हमारे भविष्य तक को दूषित करता है। कुछ ऐसे भी हैं जिनका मल-मूत्र खाद बनकर खाद्य सुरक्षा में काम आता है।

हमारा शरीर मिट्टी की उर्वरता से सीधा जुड़ा हुआ है, पानी की निर्मलता से भी। मल-मूत्र की यह कहानी स्वास्थ्य और पर्यावरण से तो जुड़ी है ही, इसमें विज्ञान भी है और धार्मिक आचरण भी, इतिहास है और भविष्य भी। ये कहानी है जल और थल के हमारे मल से संबंध की।

ये सब टटोलती हुई एक सचित्र किताब जुलाई 2016 में छप कर आई थी। पुस्तक का संस्करण पूरा बिक चुका है। अगले संस्करण की जानकारी के लिए कुछ समय बाद यहां फिर से पता कर सकते हैं। इस विचार को आगे बढ़ाने में आप सभी के सहयोग का आभार सदा ही रहेगा।

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